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रघुवंशम् • अध्याय 1 • श्लोक 40
परस्पराक्षिसादृश्यमदूरोज्झितवर्त्मसु । मृगद्वन्द्वेषु पश्यन्तौ स्यन्दनाबद्धदृष्टिषु ॥
वे रथ में बैठे हुए मार्ग से दूर न हटे हुए मृगों के जोड़ों को देखते थे, जिनकी दृष्टि एक-दूसरे से मिलती हुई प्रतीत होती थी।
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