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रघुवंशम् • अध्याय 1 • श्लोक 28
द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम् । त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥
शिष्ट व्यक्ति भले ही अप्रिय हो, परंतु पीड़ित के लिए औषधि के समान प्रिय था, और दुष्ट व्यक्ति चाहे प्रिय ही क्यों न हो, उसे सर्पदंशित उंगली की तरह त्याग दिया जाता था।
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