रेखामात्रमपि क्षुण्णादा मनोर्वर्त्मनः परम् । न व्यतीयुः प्रजास्तस्य नियन्तुर्नेमिवृत्तयः ॥
उनकी प्रजा मनु के मार्ग से तनिक भी विचलित नहीं हुई, जैसे चक्र की परिधि अपनी मर्यादा से बाहर नहीं जाती।
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