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पुरुष सुक्तम् • अध्याय 1 • श्लोक 8
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥
उनके (अर्थात् विराट के) यज्ञ (सृष्टि के यज्ञ) की पूर्ण आहुति से जमा हुआ दूध मिश्रित घी प्राप्त हुआ। जो (अर्थात घी और दूध) हवा (पक्षी) और जंगल (जंगली जानवर) और गांवों (घरेलू जानवर) दोनों के (निर्मित) जानवर हैं।
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