उनकी नाभि अन्तरिक्ष (स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का मध्यवर्ती स्थान) बन गई, उनके सिर से स्वर्ग कायम था, उनके पैरों से पृथ्वी (टिकी हुई थी) और उनके कानों से दिशाएँ (टिकी हुई थीं); इस प्रकार समस्त लोक उसके द्वारा नियंत्रित होते थे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पुरुष सुक्तम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
पुरुष सुक्तम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।