विद्वन्मनोहरा का? सत्कविता बोधवनिता च । कं न स्पृशति विपत्तिः?, प्रवृद्धवचनानुवर्तिनं दान्तं ।
क्या विद्वानों को मोहित करता है?
उन्नत करती हुई कविता और ज्ञान रुपी स्त्री।
विपत्ति किसे स्पर्श नहीं कर सकती?
जो बड़ों की आज्ञा को अनुसरता है और संयमी है।
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