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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 1 • श्लोक 22
केशावधि नखराग्रादिदमन्तः पूतिगन्धसम्पूर्णम् । बहिरपि चागरुचन्दनकर्पूराद्यैर्विलेपयति ॥
नख से लेकर शिखापर्यन्त यह सारा शरीर दुर्गन्ध से भरा हुआ है, फिर भी मनुष्य बाहर से इस पर अगरु, चन्दन और कपूर आदि का लेप करता है।
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