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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 1 • श्लोक 20
नासाग्राद्वदनादवा कफं मलं पायुतो विसृजन् । स्वयमेवैति जुगुप्सामन्तः प्रसृतं च नो वेत्ति ॥
नासिका से अथवा मुख से कफ को और गुदा से मल को त्याग करते समय मनुष्य स्वयं भी घृणा करता है तथापि इन्हें अपने शररीर के भीतर भरे हुए नहीं जानता।
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