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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 9
क्वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोह- मारोपितस्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो रजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति ॥
कभी बवंडर के समान आँखों में धूल झोंक देने वाली स्त्री गोद में बैठा लेती है तो तत्काल रागान्ध-सा होकर सत्पुरुषों की मर्यादा का भी विचार नहीं करता। उस समय नेत्रों में रजोगुण की धूल भर जाने से बुद्धि ऐसी मलिन हो जाती है कि अपने कर्मो के साक्षी दिशाओं के देवताओं को भी भुला देता है।
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