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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 8
अथ कदाचिन्निवासपानीयद्रविणा- द्यनेकात्मोपजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति ॥
कभी इस शरीर को जीवित रखने वाले घर, अन्न-जल और धन आदि में अभिनिवेश करके इस संसारारण्य में इधर-उधर दौड़-धूप करता रहता है।
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