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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 7
क्वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुणनिर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्स- त्यग्निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम् ॥
कभी बुद्धि के रजोगुण से प्रभावित होने पर सारे अनर्थों की जड़ अग्नि के मलरूप सोने को ही सुख का साधन समझकर उसे पाने के लिये लालायित हो इस प्रकार दौड़-धूप करने लगता है, जैसे वन में जाड़े से ठिठुरता हुआ पुरुष अग्नि के लिये व्याकुल होकर उल्मुक-पिशाच की (अगिया-बेताल की) ओर उसे आग समझकर दौड़े।
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