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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 45
यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय । नारायणाय हरये नम इत्युदारं हास्यन् मृगत्वमपि यः समुदाजहार ॥
उन्होंने मृगशरीर छोड़ने की इच्छा होने पर उच्चस्वर से कहा था कि धर्म की रक्षा करने वाले, धर्मानुष्ठान में निपुण, योगगम्य, सांख्य के प्रतिपाद्य, प्रकृति के अधीश्वर, यज्ञमूर्ति सर्वान्तर्यामी श्रीहरि को नमस्कार है।
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