मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 41
कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चि- न्नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरिगतोऽपि ॥
अपने पुण्यकर्मरूप लता का आश्रय लेकर यदि किसी प्रकार यह जीव इन आपत्तियों से अथवा नरक से छुटकारा पा भी जाता है तो फिर इसी प्रकार संसारमार्ग में भटकता हुआ इस जनसमुदाय में मिल जाता है। यही दशा स्वर्गादि ऊर्ध्वलोकों में जाने वालों की भी भी है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
परमहंसगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

परमहंसगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें