इस संसारमार्ग में चलने वाला यह जीव अनेक प्रकार के क्लेश और विघ्न-बाधाओं से बाधित होने पर भी मार्ग में जिस पर जहाँ आपत्ति आती है अथवा जो कोई मर जाता है; उसे जहाँ-का-तहाँ छोड़ देता है; तथा नये जन्मे हुओं को साथ लगाता है, कभी किसी के लिये शोक करता है, किसी का दुःख देखकर मूर्च्छित हो जाता है, किसी के वियोग होने की आशंका से भयभीत हो उठता है, किसी से झगड़ने लगता है, कोई आपत्ति आती है तो रोने-चिल्लाने लगता है, कहीं कोई मन के अनुकूल बात हो गयी तो प्रसनन्नता के मारे फूला नहीं समाता, कभी गाने लगता है और कभी उन्हीं के लिये बँधने में भी नहीं हिचकता। साधुजन इसके पास कभी नहीं आते, यह साधुसंग से सदा वंचित रहता है। इस प्रकार यह निरन्तर आगे ही बढ़ रहा है। जहाँ से इसकी यात्रा आरम्भ हुई है और जिसे इस मार्ग की अन्तिम अवधि कहते हैं, उस परमात्मा के पास यह अभी तक नहीं लौटा है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
परमहंसगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
परमहंसगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।