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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 37
एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति ॥
इस प्रकार धन की आसक्ति से परस्पर वैरभाव बढ़ जाने पर भी यह अपनी पूर्ववासनाओं से विवश होकर आपस में विवाहादि सम्बन्ध करता और छोड़ता रहता है।
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