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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 36
क्वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोग- विहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादाने- ऽवसितमतिस्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥
कभी धन नष्ट हो जाने से जब इसके पास सोने, बैठने और खाने आदि की भी कोई सामग्री नहीं रहती, तब अपने अभीष्ट भोग न मिलने से यह उन्हें चोरी आदि बुरे उपायों से पाने का निश्चय करता है। इससे इसे जहाँ-तहाँ दूसरों के हाथ से बहुत अपमानित होना पड़ता है।
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