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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 35
क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धन- मुपयाति वित्तशाठ्येन ॥
कभी आपस में क्रय-विक्रय आदि व्यापार करने पर बहुत कंजूसी करने से इसे थोड़ा-सा धन हाथ लग जाता है।
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