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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 34
क्वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिका- त्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते ॥
कभी-कभी शीत, वायु आदि अनेक प्रकार के आधिदेविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दु:खों की निवृत्ति करने में जब असफल हो जाता है, तब उस समय अपार विषयों की चिन्ता से यह खिन्‍न हो उठता है।
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