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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 33
एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये ॥
इस प्रकार प्रवृत्तिमार्ग में पड़कर सुख-दुःख भोगता हुआ यह जीव रोगरूपी गिरिगुहा में फँसकर उसमें रहने वाले मृत्युरूप हाथी से डरता रहता है।
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