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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 32
क्वचिद्द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः ॥
वृक्षों के समान जिनका लौकिक सुख ही फल है - उन घरों में ही सुख मानकर वानरों की भाँति स्त्री-पुत्रादि में आसक्त होकर यह अपना सारा समय मैथुनादि विषय-भोगों में ही बिता देता है।
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