ये पाखण्डी तो स्वयं ही धोखे में हैं; जब यह भी उनकी ठगाई में आकर दुःखी होता है, तब ब्राह्मणों की शरण लेता है। किन्तु उपनयनसंस्कार के अनन्तर श्रौत-स्मार्तकर्मो से भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना करना आदि जो उनका शास्त्रोक्त आचार है, वह इसे अच्छा नहीं लगता; इसलिये वेदोक्त आचार के अनुकूल अपने में शुद्धि न होने के कारण यह कर्मशून्य शूद्रकुल में प्रवेश करता है, जिसका स्वभाव वानरों के समान केवल कुटुम्बपोषण और स्त्रीसेवन करना ही है।
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