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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 29
कदाचिदीश्वरस्य भगवतो विष्णोश्चक्रा- त्परमाण्वादि द्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणा- त्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्म- तृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्ड- देवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमय- परिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते ॥
कालचक्र साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णु का आयुध है। वह परमाणु से लेकर द्विपरार्धपर्यन्त क्षण-घटी आदि अवयवों से युक्त है। वह निरन्तर सावधान रहकर घूमता रहता है, जल्दी-जल्दी बदलने वाली बाल्य, यौवन आदि अवस्थाएँ ही उसका वेग हैं। उसके द्वारा वह ब्रह्मा से लेकर श्षुद्रातिश्लुद्र तृणपर्यन्त सभी भूतों का निरन्तर संहार करता रहता है। कोई भी उसकी गति में बाधा नहीं डाल सकता। उससे भय मानकर भी जिनका यह कालचक्र निज आयुध है, उन साक्षात्‌ भगवान्‌ यज्ञपुरुष की आराधना छोड़कर यह मन्दमति मनुष्य पाखण्डियों के चक्कर में पड़कर उनके कंक, गिद्ध, बगुला और बटेर के समान आर्यशास्त्र-बहिष्कृत देवताओं का आश्रय लेता है - जिनका केवल वेद बाह्य अप्रामाणिक आगमों ने ही उल्लेख किया है।
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