(इस विघ्नबहुल मार्ग में इस प्रकार भटकता हुआ यह जीव) किसी समय देवमायारूपिणी स्त्री के बाहुपाश में पड़कर विवेकहीन हो जाता है। तब उसी के लिये विहारभवन आदि बनवाने की चिंता में ग्रस्त रहता है तथा उसी के आश्रित रहने वाले पुत्र, पुत्री और अन्यान्य स्त्रियों के मीठे-मीठे बोल, चितवन और चेष्टाओं में आसक्त होकर, उन्हीं में चित्त फँस जाने से वह इन्द्रियों का दास अपार अन्धकारमय नरकों में गिरता है।
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