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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 26
क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धन- मन्येभ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात् ॥
कभी परस्पर लेन-देन का व्यवहार करते समय किसी दूसरे का थोड़ा-सा-दमड़ी भर अथवा इससे भी कम धन चुरा लेता है तो इस बेईमानी के कारण उससे बैर ठन जाता है।
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