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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 25
क्वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविक- भौतिकात्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणे- ऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते ॥
कभी-कभी शीत और वायु आदि अनेकों आधिदेविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःख की स्थितियों के निवारण करने में समर्थ न होने से यह अपार चिन्ताओं के कारण उदास हो जाता है।
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