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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 22
कर्हि स्म चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये ॥
कभी विषयसुखरूप मधुकणों को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जब यह लुकछिपकर परस्त्री या परधन को उड़ाना चाहता है, तब उनके स्वामी या राजा के हाथ से मारा जाकर ऐसे नरक में जा गिरता है, जिसका ओर-छोर नहीं है।
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