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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 21
कदाचिद्भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकै- रलब्धनिद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानु- क्षीयमाणविज्ञानोऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति ॥
कभी दुर्जनरूप काटने वाले जीव इतना काटते-तिरस्कार करते हैं कि इसके गर्वरूप दाँत, जिनसे यह दूसरों को काटता था, टूट जाते हैं। तब इसे अशान्ति के कारण नींद भी नहीं आती तथा मर्मवेदना के कारण क्षण-क्षण में विवेकशक्ति क्षीण होते रहने से अन्त में अन्धे की भाँति यह नरकरूप अन्धे कुएँ में जा गिरता है।
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