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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 2
यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं बहु कृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति । तद्धर्म्यं धनं दर्शनस्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राण- सङ्कल्पव्यवसायगृहग्राम्योपभोगेन कुनाथस्याजितात्मनो यथा सार्थस्य विलुम्पन्ति ॥
पुरुष बहुत-सा कष्ट उठाकर जो धन कमाता है, उसका उपयोग धर्म में होना चाहिये; वही धर्म यदि साक्षात्‌ भगवान्‌ परमपुरुष की आराधना के रूप में होता है तो उसे परलोक में नि:श्रेयस का हेतु बतलाया गया है। किन्तु जिस मनुष्य का बुद्धिरूप सारथि विवेकहीन होता है और मन वश में नहीं होता, उसके उस धर्मोपयोगी धन को ये मन सहित छः इन्द्रियाँ देखना, स्पर्श करना, सुनना, स्वाद लेना, सूँघना, संकल्पविकल्प करना और निश्चय करना - इन वृत्तियों के द्वारा गृहस्थोचित विषयभोगों में फँसाकर उसी प्रकार लूट लेती हैं, जिस प्रकार बेईमान मुखिया का अनुगमन करने वाले एवं असावधान बनजारों के दल का धन चोर-डाकू लूट ले जाते हैं।
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