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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 19
क्वचिच्च दुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति ॥
कभी पेट की असह्य ज्वाला से अधीर होकर अपने कुट॒म्ब पर ही बिगड़ने लगता है।
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