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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 17
कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यस- त्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति ॥
कभी मनोरथ के पदार्थो के समान अत्यन्त असत्‌ पिता-पितामह आदि सम्बन्धों को सत्य समझकर उनके सहवास से स्वप्न के समान क्षणक सुख का अनुभव करता है।
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