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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 15
क्वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुर- मसुखोदर्कं शोकाग्निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥
कभी दावानल के समान प्रिय विषयों से शून्य एवं परिणाम में दुःखमय घर में पहुँचता है तो वहाँ इष्टजनों के वियोगादि से उसके शोक की आग भड़क उठती है; उससे सन्तप्त होकर वह बहुत ही खिन्‍न होने लगता है।
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