यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति
तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु
भक्षयति ॥
जब दूसरों को सताने से उसे अन्न भी नहीं मिलता, तब वह अपने सगे पिता-पुत्रों की अथवा पिता या पुत्र आदि का एक तिनका भी जिनके पास देखता है, उनको फाड़ खाने के लिये तैयार हो जाता है।
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