स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदा कारस्कर-
काकतुण्डाद्यपुण्यद्रुमलताविषोदपानव-
दुभयार्थशून्यद्रविणान् जीवन्मृतान् स्वयं
जीवन् म्रियमाण उपधावति ॥
पूर्वपुण्य क्षीण हो जाने पर यह जीवित ही मुर्दे के समान हो जाता है; और जो कारस्कर एवं काकतुण्ड आदि जहरीले फलों वाले पाप-वृक्षों, इसी प्रकार की दूषित लताओं और विषैले कुओं के समान हैं तथा जिनका धन इस लोक और परलोक दोनों के ही काम में नहीं आता और जो जीते हुए भी मुर्दे के समान हैं - उन कृपण पुरुषों का आश्रय लेता है।
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