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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 11
क्वचिदुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेना- तिव्यथितकर्णमूलहृदयः ॥
कभी प्रत्यक्ष शब्द करने वाले उल्लू के समान शत्रुओं की और परोक्षरूप से बोलने वाले झींगुरों के समान राजा की अति कठोर एवं दिल को दहला देने वाली डरावनी डाँट-डपट से इसके कान और मन को बड़ी व्यथा होती है।
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