क्वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं
पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव
मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति ॥
कभी अपने-आप ही एकाध बार विषयों का मिथ्यात्व जान लेने पर भी अनादिकाल से देह में आत्मबुद्धि रहने से विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाने के कारण उन मरुमरीचिका तुल्य विषयों की ओर ही फिर दौड़ने लगता है।
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