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परमहंसगीता • अध्याय 5 • श्लोक 1
स होवाच य एष देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुण- विशेषविकल्पितकुशलाकुशलसमवहार- विनिर्मितविविधदेहावलिभिर्वियोग- संयोगादि अनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन् दुर्गाध्ववदसुगमेऽध्वन्यापतित ईश्वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानव- दशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्तत्तापोपशमनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवी- मवरुन्धे ॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं - हे राजन्‌! देहाभिमानी जीवों के द्वारा सत्त्वादि गुणों के भेद से शुभ, अशुभ और मिश्र - तीन प्रकार के कर्म होते रहते हैं। उन कर्म के द्वारा ही निर्मित नाना प्रकार के शरीरों के साथ होने वाला जो संयोग-वियोगादिरूप अनादि संसार जीव को प्राप्त होता है, उसके अनुभव के छः द्वार हैं - मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनसे विवश होकर यह जीवसमूह मार्ग भूलकर भयंकर वन में भटकते हुए धन के लोभी बनजारों के समान परमसमर्थ भगवान्‌ विष्णु के आश्रित रहने वाली माया की प्रेरणा से बीहड़ वन के समान दुर्गम मार्ग में पड़कर संसार-वन में जा पहुँचता है। यह वन श्मशान के समान अत्यन्त अशुभ है। इसमें भटकते हुए उसे अपने शरीर से किये हुए कर्मो का फल भोगना पड़ता है। यहाँ अनेकों विघ्नों के कारण उसे अपने व्यापार में सफलता भी नहीं मिलती तो भी यह उसके श्रम को शान्त करने वाले श्रीहरि एवं गुरुदेव के चरणारविन्द-मकरन्द-मधु के रसिक भक्त- भ्रमरों के मार्ग का अनुसरण नहीं करता। इस संसारवन में मनसहित छः इन्द्रियाँ ही अपने कर्मो की दृष्टि से डाकुओं के समान हैं।
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