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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 9
एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त मसन्निधानात्परमाणवो ये । अविद्यया मनसा कल्पितास्ते येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥
इस प्रकार 'पृथ्वी' शब्द का व्यवहार भी मिथ्या ही है; वास्तविक नहीं है; क्योंकि यह अपने उपादानकारण सूक्ष्म परमाणुओं में लीन हो जाती है। और जिनके मिलने से पृथ्वीरूप कार्य की सिद्धि होती है, वे परमाणु अविद्यावश मन से ही कल्पना किये हुए हैं। वास्तव में उनकी भी सत्ता नहीं है।
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