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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 7
शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्णन् निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभासु धृष्टः ॥
किन्तु इसी से तुम्हारी कोई श्रेष्ठता सिद्ध नहीं होती, वास्तव में तो तुम बड़े क्रूर और धुृष्ट ही हो। तुमने इन बेचारे दीन-दुखिया कहारों को बेगार में पकड़कर पालकी में जोत रखा है और फिर महापुरुषों की सभा में बढ़-बढ़कर बातें बनाते हो कि मैं लोकों की रक्षा करने वाला हूँ। यह तुम्हें शोभा नहीं देता।
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