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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 2
ज्वरामयार्तस्य यथागदं सन्निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः । कुदेहमानाहिविदष्टदृष्टे- र्ब्रह्मन्वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥
हे ब्रह्मन्‌! जिस प्रकार ज्वर से पीड़ित रोगी के लिये मीठी ओषधि और धूप से तपे हुए पुरुष के लिये शीतल जल अमृततुल्य होता है, उसी प्रकार मेरे लिये, जिसकी विवेकबुद्धि को देहाभिमानरूप विषैले सर्प ने डस लिया है, आपके वचन अमृतमय ओषधि के समान हैं।
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