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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 16
तस्मान्नरोऽसङ्गसुसङ्गजात- ज्ञानासिनेहैव विवृक्णमोहः । हरिं तदीहाकथनश्रुताभ्यां लब्धस्मृतिर्यात्यतिपारमध्वनः ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ब्राह्मणरहूगणसंवादे द्वादशोऽध्यायः ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे परमहंसगीतायां तृतीयोऽध्यायः ।
इसलिये विरक्त महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त ज्ञानरूप खड़्ग के द्वारा मनुष्य को इस लोक में ही अपने मोहबन्धन को काट डालना चाहिये। फिर श्रीहरि की लीलाओं के कथन और श्रवण से भगवत्स्मृति बनी रहने के कारण वह सुगमता से ही संसारमार्ग को पार करके भगवान्‌ को प्राप्त कर सकता है।
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