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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 14
अहं पुरा भरतो नाम राजा विमुक्तदृष्टश्रुतसङ्गबन्धः । आराधनं भगवत ईहमानो मृगोऽभवं मृगसङ्गाद्धतार्थः ॥
पूर्वजन्म में भरत नाम का राजा था। ऐहिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त होकर भगवान्‌ की आराधना में ही लगा रहता था; तो भी एक मृग में आसक्ति हो जाने से मुझे परमार्थ से भ्रष्ट होकर अगले जन्म में मृग बनना पड़ा।
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