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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 11
ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक- मनन्तरं त्वबहिर्ब्रह्म सत्यम् । प्रत्यक्प्रशान्तं भगवच्छब्दसंज्ञं यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥
विशुद्ध परमार्थरूप, अद्वितीय तथा भीतर-बाहर के भेद से रहित परिपूर्ण ज्ञान ही सत्य वस्तु है। वह सर्वान्तर्वर्ती और सर्वथा निर्विकार है। उसी का नाम ' भगवान्‌' है और उसी को पण्डितजन 'वासुदेव' कहते हैं।
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