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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 10
एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्यदसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म- नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम् ॥
इसी प्रकार और भी जो कुछ पतला-मोटा, छोटा-बड़ा, कार्य-कारण तथा चेतन और अचेतन आदि गुणों से युक्त द्वैत-प्रपंच है - उसे भी द्रव्य, स्वभाव, आशय, काल और कर्म आदि नामों वाली भगवान्‌ की माया का ही कार्य समझो।
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