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परमहंसगीता • अध्याय 3 • श्लोक 1
रहूगण उवाच नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय । नमोऽवधूतद्विजबन्धुलिङ्ग- निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥
राजा रहूगण ने कहा - हे योगेश्वर! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपने जगत्‌ का उद्धार करने के लिये ही यह देह धारण की है। अपने परमानन्दमय स्वरूप का अनुभव करके आप इस स्थूल शरीर उदासीन हो गये हैं तथा एक जड ब्राह्मण के वेष से अपने नित्यज्ञानमय स्वरूप को जनसाधारण की दृष्टि से ओझल किये हुए हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ।
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