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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 5
स वासनात्मा विषयोपरक्तो गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । बिभ्रत्पृथङ्नामभि रूपभेद- मन्तर्बहिष्ट्वं च पुरैस्तनोति ॥
यह मन वासनामय, विषयासक्त, गुणों से प्रेरित, विकारी और भूत एवं इन्द्रिरूप सोलह कलाओं में मुख्य है। यही भिन्‍न-भिन्‍न नामों से देवता और मनुष्यादिरूप धारण करके शरीररूप उपाधियों के भेद से जीव की उत्तमता और अधमता का कारण होता है।
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