न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षा-
द्वरीयसीरपि वाचः समासन् ।
स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं
न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥
जिसे गृहस्थोचित यज्ञादि कर्मो से प्राप्त होने वाला स्वर्गादि सुख स्वप्न के समान हेय नहीं जान पड़ता, उसे तत्त्वज्ञान कराने में साक्षात् उपनिषद्-वाक्य भी समर्थ नहीं है।
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