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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 16
न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं संसारतापावपनं जनस्य । यच्छोकमोहामयरागलोभ- वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥
क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह, रोग, राग, लोभ और बैर आदि के संस्कार तथा ममता की वृद्धि करता रहता है।
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