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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 15
न यावदेतां तनुभृन्नरेन्द्र विधूय मायां वयुनोदयेन । विमुक्तसङ्गो जितषट्सपत्नो वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् ॥
राजन्‌! जब तक मनुष्य ज्ञानोदय के द्वारा इस माया का तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम-क्रोधादि छ: शत्रुओं को जीतकर आत्मतत्त्व को नहीं जान लेता और जब तक वह आत्मा के उपाधिरूप मन को संसारदु:ख का क्षेत्र नहीं समझता, तब तक वह इस लोक में यों ही भटकता रहता है।
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