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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 13
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात्स्वयंज्योतिरजः परेशः । नारायणो भगवान्वासुदेवः स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः ॥
यह क्षेत्रज्ञ परमात्मा सर्वव्यापक, जगत्‌ का आदिकारण, परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयंप्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मादि का भी नियंता और अपने अधीन रहने वाली माया के द्वारा सबके अन्त:करणों में रहकर जीवों को प्रेरित करने वाला समस्त भूतों का आश्रयरूप भगवान्‌ वासुदेव है।
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