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परमहंसगीता • अध्याय 2 • श्लोक 12
क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूतीर्जीवस्य मायारचितस्य नित्याः । आविर्हिताः क्वापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥
ऐसा होने पर भी मन से क्षेत्रज्ञ का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो जीव की ही मायानिर्मित उपाधि है। यह प्राय: संसारबन्धन में डालने वाले अविशुद्ध कर्मो में ही प्रवृत्त रहता है। इसकी उपर्युक्त वृत्तियाँ प्रवाहरूप से नित्य ही रहती हैं; जाग्रत्‌ और स्वप्न के समय वे प्रकट हो जाती हैं और सुषुप्ति में छिप जाती हैं। इन दोनों ही अवस्थाओं में क्षेत्रज्ञ, जो विशुद्ध चिन्मात्र है, मन की इन वृत्तियों को साक्षीरूप से देखता रहता है।
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